धर्म संस्कृति

खुदा की रहमत का महिना हैं रमजान, करें खुदा की इबादत

  • खुदा की राह में समर्पित कर देने का प्रतीक पाक महीना माह-ए-रमजान न सिर्फ रहमतों, बरकतों की बारिश का महीना है, बल्कि समूची मानव जाति को प्रेम भाईचारे और इंसानियत का संदेश भी देता है।मुस्लिम भाइयों के माह-ए-रमजान का चांद दिख गया है और इसी के साथ खुदा की इबादत का पाक महीना शुरू हो गया है। करीब तीस साल बाद रमजान का महीना जून में पड़ रहा है। खुदा की राह में समर्पित कर देने का प्रतीक पाक महीना माह-ए-रमजान न सिर्फ रहमतों और बरकतों की बारिश का महीना है, बल्कि समूची मानव जाति को प्रेम भाईचारे और इंसानियत का संदेश भी देता है। लोगों का ईश्वर के प्रति ये अटूट विश्वास है कि इस पाक महीने में अल्लाह अपने बंदों पर रहमतों का खजाना लुटाते हैं। अच्छाइयों की जीत हो और बुराइयों का नाश हो ऐसा ही है माह-ए-रमजान चांद के दीदार

नेकी कमाने का महीना
माह-ए-रमजान नेकी कमाने का महीना है। अपने गुनाहों की माफी मांगें। सिर्फ इस एक महिने के लिए ही नहीं अपितु अपने आप से सभी दिन के लिए गुनाह ना करने, इंसानियत धर्म का पालन करने की कसम खााना ही पाक महीने की सफलता होगी और तब ही सही मायने में खुदा बंदे से खुश हो कर आशीष देंगे ।
सब्र का इम्तेहान
ऐसा माना जा रहा है कि इस बार रोजा रखने वालों की परीक्षा कड़ी होगी क्योंकि गर्मी के चलते रोजे 15 घंटे के होंगे। माना जा रहा है कि 21 जून को रमजान का सबसे बड़ा रोजा होगा जो कि 15 घंटे और 28 मिनट का होगा जबकि कोई भी रोजा 15 घंटे 21 मिनट से कम का नहीं होगा। रमजान के दौरान सहरी का वक्त सुबह 4 बजे के आसपास व इफ्तार शाम 7.20 के बाद होगा। हालांकि सच्चे खुदा के बंदे के लिए जहां इतने घंटे वहीं कुछ और घंटे जब आस्था हो तो समय का घटना बढना मायने नहीं रखता।
रमजान का संदेश
खुद को खुदा की राह में समर्पित कर देने का प्रतीक पाक महीना माह-ए-रमजान न सिर्फ रहमतों और बरकतों की बारिश का वकफा है बल्कि समूची मानव जाति को प्रेम, भाईचारे और इंसानियत का संदेश भी देता है। मौजूदा हालात में रमजान का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। इस पाक महीने में अल्लाह अपने बंदों पर रहमतों का खजाना लुटाता है और भूखे-प्यासे रहकर खुदा की इबादत करने वालों के गुनाह माफ हो जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस माह में दोजख (नरक) के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और जन्नत की राह खुल जाती है। लोगों के लिए रोजा अच्छी जिंदगी जीने का प्रशिक्षण है जिसमें इबादत कर खुदा की राह पर चलने वाले इंसान का जमीर रोजेदार को एक नेक इंसान के व्यक्तित्व के लिए जरूरी है। दुनिया भूख, प्यास और इंसानी ख्वाहिशों के गिर्द घूमती है और रोजा इन तीनों चीजों पर नियंत्रण रखने की साधना है। रमजान का महीना तमाम इंसानों के दुख-दर्द और भूख-प्यास को समझने का महीना है ताकि रोजेदारों में भले-बुरे को समझने की सलाहियत पैदा हो।जहां एक तरफ झूठ, मक्कारी, अश्लीलता और यौनाचार का बोलबाला हो चुका है। ऐसे में मानव जाति को संयम और आत्मनियंत्रण का संदेश देने वाले रोजे का महत्व और भी बढ़ जाता है। बशर्ते की हम इसका अनुपालन सही ढंग से करें। जैसे झूठ बोलने, चुगली करने, किसी पर बुरी निगाह डालने, किसी की निंदा करने और हर छोटी से छोटी बुराई से दूर रहना अनिवार्य है। रोजे रखने का असल मकसद महज भूख-प्यास पर नियंत्रण रखना नहीं है बल्कि रोजे की रूह दरअसल आत्म संयम, नियंत्रण, अल्लाह के प्रति आस्था और सही राह पर चलने के संकल्प और उस पर मुस्तैदी से अमल करना चाहिए। यह महीना इंसान को अपने अंदर झाँकने और खुद का मूल्यांकन कर सुधार करने का मौका भी देता है। दुनिया के लिए रमजान का महीना इसलिए भी अहम है क्योंकि अल्लाह ने इसी माह में हिदायत की सबसे बड़ी किताब यानी कुरान शरीफ का दुनिया में अवतरण शुरू किया था। रहमत और बरकत के नजरिए से रमजान के महीने को तीन हिस्सों (अशरों) में बाँटा गया है। इस महीने के पहले 10 दिनों में अल्लाह अपने रोजेदार बंदों पर रहमतों की बारिश करता है। दूसरे अशरे में अल्लाह रोजेदारों के गुनाह माफ करता है और तीसरा अशरा दोजख की आग से निजात पाने की साधना को समर्पित किया गया है।

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